रक्षाबंधन का अध्यात्मिक अर्थ श्रीमद् भगवत गिता द्वारा

 








रक्षाबंधन  का  अध्यात्मिक अर्थ श्रीमद् भगवत गिता द्वारा


🎇रक्षाबंधन की शुभकामनाएं! 🎇

 अध्यात्मिक -  रक्षाबंधन एक बहुत ही पवित्र और प्रेमपूर्ण त्योहार है यह भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। ्की रक्षाबंधन कितना प्यारा त्यौहार है । स्नेह भरे संबंध की यादगार है । कितनी खुशी से यह त्यौहार मनाते आए हैं। मित्र जन मिलकर के खुशी से यह त्यौहार मनाते हैं।               ‌

श्रावण मास पूरा ही शिव का होता है उसी का गायन और पूजन होता है श्रावण मास में ही पूर्णिमा को यह रक्षाबंधन त्यौहार मनाते हैं । श्रावण के महीने में जब जल बहुत बरसता है ज्ञान जल की बरसात भगवान आकर करता है । उसमें जो श्रावण का महीना में खूब बरसात होती है । बुद्धि में ज्ञान तरो ताजा बैठता है लोगों की  तो भगवान बाप आकर के बड़े से बड़ा ब्राह्मण बनता है माने ब्रह्मा की औलाद कोई बच्चे में प्रवेश करता है उसको नाम दिया है शास्त्रो में सनदकुमार। सनदकुमार के नाम से हमारे धर्म का नाम पड़ता है सनातन धर्म ,जैसे बुद्ध से बौद्ध धर्म क्राईस्ट से  क्रिश्चियन धर्म मोहम्मद से मुस्लिम धर्म ऐसे ही सनदकुमार के नाम से हमारे धर्म का नाम क्या पड़ा "सनातन  सनातन देवी देवता धर्म  "।  

                 थोड़ा सोचिए यह त्यौहार तो हम मनाते आए हैं बहुत समय से लेकिन क्या इस त्यौहार की गुहयता को हम समझ पाए हैं ? रक्षाबंधन  के सही अर्थ को समझ पाए हैं  ?  सवाल यह उठता है कि यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है ? यह प्रथा कहां से निकली है?  किसने निकाली है ? इसका सही अर्थ क्या है?

                  राखी रक्षा की निशानी है।  रक्षाबंधन  शब्द में रक्षा और बंधन दो का मेल दिखाई देता है । बंधन ! कैसा बंधन? रक्षा करने का! हां, रक्षा करना बंधनकारी,  किसके लिए  ?,

भगवान को अपने भक्त प्रति

गुरु को अपने शिष्यों प्रति

राजा को अपनी प्रजा के प्रति

जवानोंको अपने देश के प्रति

मां को अपने बच्चे के प्रति

पति को पत्नि के प्रति

दोस्त को दोस्त के प्रति रक्षाका  दायित्व  बंधन  । क्या रक्षाबंधन का त्योहार इन रिश्तों  के लिए  नहीं है ?

श्रीमद् भगवत गीता अध्याय 6/5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।

आत्मैव ह्रात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ।।

भावार्थ:-अपने मन बुद्धि द्वारा ज्योति बिंदु आत्मा को ऊंची स्थिति में ले जाए आत्मा को (भ्रष्ट इंद्रियों की) अधोगति में ना जाने दे, क्योंकि ज्योति बिंदु आत्मा ही अपना (सदाकाल) (सहयोगी) मित्र है आत्मा ही अपना शत्रु है।

रक्षाबंधन  किसकी रक्षा की बात है?

मन बुद्धि रूपी आत्मा की रक्षा करना पांच विकारोंसे।

कौन करता है रक्षा ? आत्मा का पिता परमात्मा कैसे करता है रक्षा? आत्मा का परिचय देकर वे स्वयं का भी परिचय देते हैं और हमारा भी। हम कौन हैं ? हम देह नहीं आत्मा है । वो अखुट ज्ञान का भंडारी ज्ञान से हम आत्माकी रक्षा करता है आत्मा को ऊपर ऊंची स्टेज में रहनेका ज्ञान देकर जिससे हम मनुष्य से देवता बनते हैं ।

रक्षाबंधन जो विकारो के बधंन से रक्षा की, विकारो के बंधन से जो बचाते है।

श्लोक 9/22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्

  जो अव्यभिचारी लोग मेरी जोतिबिंदुस्वरूप+ लिंगरूप की प्रव्रुत्ति में ध्यानमग्न  हुए सर्वसमर्पित ( तन मन धन, समय संपर्क सर्व  संबंध आदि सब प्रकार से मेरे निकट रहते हैं। )उपासक हैं,बेहद डामा के नियम प्रमाण उन निरन्तर समर्पित योगियों के अप्राप्य दुर्लभ वस्तुओं की प्राप्ति और उनकी रक्षा का भार मैं कल्पान्त के महाविनाश में वहन करता हु।

यहा स्पष्ट कहा है भगवंत ने उनका वादा है की जो मुझ साकार निराकार के मेल को पहचानकर मेरी याद में रहता है मेरे लिए ही यजन करता है अर्थात मदयाजी भव्  हो जाता है उसकी रक्षाका भार मैं वहन करता हु।

          पहले सतोप्रधान समय था तब  घर घर में ब्राह्मण  जाकर राखी बांधते थे । जब तामसी स्टेज होती है  तमोप्रधान दुनिया कलियुग  बनति है तो बहने भाई को राखी बांधती है  कुछ खर्चे पानी निकले पैसे लेते हैं भाईयोंसे  ।

क्या भाई को राखी बांधने से बहन सच में सुरक्षित रह पाती है ? उसकी तकलीफोनसे उसे मुक्ति मिलती है ? मुक्ति पाती है ? ऐसा तो है नहीं !

सीता के रखवाले राम,  जब हरण हुआ सिता का तब कोई नहीं था ।

द्रोपदी के पांच पति थे, जब चीर हरण हुआ तब कोई नहीं था ।

दशरथ के चार दुलारे थे,  जब प्राण तजे तब कोई नहीं था।

रावण  बलशाली था , जब लंका जली तब कोई नहीं था ।

कृष्ण  सुदर्शन चक्रधारी थे , जब तीर लगा तब कोई नहीं था ।

अभिमन्यु राज दुलारे थे पर चक्रव्यूह में फंसे,  तब कोई नहीं था।

सच यही है की,  एक भगवान रखवाला दूसरा कोई नहीं है । गायन भी है - " दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया "

ईश्वर राम  परमपिता परमात्मा आत्मा  रूपी  सीताओं की रक्षा करते हैं ।

              बुलाते भी है ,की हे पतित पावन आओ तो जरूर पवित्रता के बंधन में बांधते होंगे ना ! जरूर पतीतों को पावन बनाने वाले ने राखी बांधी होगी । तुमसे प्रतिज्ञा ली होगी यह प्रतिज्ञा ही रक्षाबंधन की प्रतिज्ञा की निशानी है। पवित्रता की रक्षा का बंधन बांधते हैं ईश्वर, जब  इस सुष्टि पर आते हैं ।

               प्रजापिता ब्रह्मा   वह पहला पहला ब्राह्मण है।  बड़े से बड़ा ब्राह्मण जो ब्राह्मण आकर के उसके मुख में परमात्मा प्रवेश करके सब बच्चों को राखी बांधता है। रक्षा करने की राखी ! कैसे रक्षाका  बंधन?  काहे के बंधन? विकारों ने जो बंधन बांधरखा है उस बंधन से रक्षा की ।  तुम अपने देहअभीमानको ,काम को ,क्रोध को,लोभ को ,मोह को,अहंकार को मार दो, देहअहंकार को मार दोगे तो राख बना देने के बाद वह पैदा ही नहीं होगा नहीं तो लोग समझते हैं अगर राख को हम गंगा में  बहावेंगे  तो वह भूत प्रेत नहीं बनेगा  तो उसकी राख भी ना रह जाए काम क्रोध लोभ अहंकार देह अभिमान की भस्म बना दो जला दो योगाग्नि में । प्रजापिता जो पहले ब्राह्मण है वह क्या कर रहा है क्या ज्ञान सुना रहा है कौन सा ज्ञान!  ज्ञान का कौन सा सूत्र है बढ़ रहा है पवित्रता की राखी का सूत्र बढ़ रहा है यह आखिरी जन्म रह गया इसमें भी बहुत कुछ भोग लिया अब थोड़ा समय पवित्र रह लो यह मोह ममता त्याग दो इच्छा मात्रम् अविदया कर दो तो तुम्हारा बहुत कल्याण हो जाएगा । जन्म जन्मांतर का यह पवित्रता की राखी ब्राह्मण (प्रजापिता ब्रह्मा)आकर बांधता है । अपवित्रता से तुम अपनी रक्षा करो यह रक्षाबंधन हम तुम्हें बांधता हूं इस बंधन में बंधो  बंधकरके रहो भाई बहन बनो जैसे भाई बहन  को कुदृष्टि रखता है तो बहुत खराब माना जाता है।

       ‌‌   योगी बनो पवित्र बनो । रक्षा का बंधन । विकारों से  रक्षा के बंधन से जो बांधता है । वो रक्षाबंधन सारी दुनिया में कोई धर्मात्मा हो महात्मा हो धर्मपिता हो कोई भी विकारों से रक्षा कर नहीं सका एक ईश्वर ही है ब्राह्मण बनकर के राखी बांधता है काय की राखी?  पवित्रता के बंधन की राखी बांधता है । विकारों से रक्षा करने की प्रतिज्ञा कराते हैं। पांच विकारों से रक्षा के सूत्र में बच्चों को  बांधते हैं ।  रक्षा करता है वही रक्षाबंधन का अर्थ है।

              रक्षाबंधन है पवित्रताका प्रतिज्ञा पत्र की निशानी सबको कहना होता है कि पवित्र रहने की ये राखी बांधों  ये रक्षा का सूत्र हाथ में बांधा जाता है । तुमने बुद्धि रूपी हाथ में बांधा था । भक्ति मार्ग में स्थूल हाथ में राखीबांधने लग पड़े । तुमने तो उनकी  बुद्धि रूपी हाथ को बांधा था पवित्रता के बंधन में जब पूरा पक्के हो करके राखी बांधते हैं तब तुम अपना राज्य भाग लेते हो।

                    भगवान  बाप आकर पांच विकारों से रक्षा के सुत्र में बांधता है । पहला ब्राह्मण है प्रजापिता ब्रह्मा । वो ब्राह्मण वो ब्राह्मण ज्ञान रत्नों की खर्चि मिलती अगर पवित्रता का बंधन बांधती है तो ब्रह्मा द्वारा राखी बांधते हैं । बुद्धि रूपी हाथ बाप आकरके ब्राह्मण बनकरके हम बच्चों  का  बुद्धि रूपी हाथ में धागा बांध रहे हैं । ब्रह्मा द्वारा पतित से पावन बना रहे हैं।

रक्षा की ! काहे से रक्षा की ? विकारोंने जो बंधन बांध रखा है उस बंधन से रक्षा की । कीसने रक्षा की ? प्रजापिता ब्रह्मा बाप हमारा रक्षक है। सर्टेन है कि हम उचे उठनेवाले हैं । कुछ भी हो जाए लेकिन हम नीचे गिर के नष्ट होनेवाले नहीं है ।कुछ भी हो जाए लेकिन हम नीचे गिरने वाले नहीं हैं। विजय हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। क्योंकि बाप हमारा रक्षक है सभी दुखों से दूर करने वाला एक परमपिता परमात्मा रक्षक के रुपमे बाप मिला है।

                    जो कुरान में लिखा है जब विनाश बढ़ता होगा तब खुदा के बंदे बड़ी मौज में रहते हैं बड़े खुशनसीब रहते हैं उनका रक्षक साक्षात भगवान उनकी रक्षा करता है । काहे से रक्षा करता है ? माया से रक्षा करता है। विनाश की एक्टिविटी जिससे रक्षा करता है ।प्रकृति के प्रकोप से रक्षा करता है। हमारे ऊपर रक्षक भगवान बैठा हुआ है हमारी रक्षा करने के लिए।

द्रोपदी की लाज रखने वाला भगवान है ।

  पति की बात अगर पत्नी ने नहीं मानी तो उसकी बात सबको जाकर बतायेगा उसको नंगा कर देगा दुनिया के सामने । बाप बच्ची को नहीं छोड़ता ,भाई बहन को नहीं छोड़ता ,मामा भांजे को नहीं छोड़ता ।

           महाभारत में भी देखा है शिशुपाल वध के समय कृष्ण की उंगली कटती है तब द्रौपदी अपने साड़ी का पल्लोसे कपड़ा फाड़ कृष्ण के हाथ को बांध लिया इसलिए भगवान ने पूरी उम्र द्रोपदी की रक्षा करने का वचन दिया था इस वचन को कृष्ण ने बखुबी निभाया भी जब द्रोपदी का चीर हरण हुआ उस समय पांचो पति होते हुए और भीष्म पितामह द्रोणाचार्य कृपाचार्य जैसे बड़े-बड़े महारथी होते हुए भी उसकी रक्षा नहीं कर पाए तो उस समय द्रौपदी ने किसको याद किया एक भरोसे एक बल एक  उस समय उसकी रक्षा किसने की एक भगवान ने !

   एक भगवानही है जो हमारा सर्व संबंधों से साथ निभाते हैं गित भी गाते हैं  "  तुम ही स्वामी सखा तुम्ही सहारे हो, जिनके कछु आधार नहीं तुम्हें उनके रखवाले हो "  तब भी जब सारे सहारे हमारा साथ छोड़ देते हैं तब भी वो हमारा हाथ थामें रहता है।

         भागवत में कहा हुआ  है । कृष्ण क्या है? कन्हैया है । कन्हैया कीसका रक्षक ? कन्याओं का रक्षा की उनको गौवो के  रूप में दिखा दिया है।

         धागे वाली राखी बांधने से कोई पवित्र बनजाता है क्या ? भक्ति मार्ग में जन्म जन्मांतर राखी बांधते आए हैं कोई पवित्र बना क्या?

                 राखी नहीं बांधते तो क्या भाई बहन के रक्षा नहीं करेगा ?किसी को भाई ही ना हो तो क्या उनकी रक्षा नहीं होगी ? सबका रखवाला तो ऊपर वाला गाया जाता है । उनको राखी क्यों नहीं बांधी जाती ,कहते भी है ,"जाको राखे साइयां मार सके ना कोई बाल भी बाका  कर न सके जो जग बैरी होय "क्या आप अपने को हर पल ऐसे सुरक्षित महसूस कर रहे हैं? क्या ऐसी सुरक्षा संभव भी है ? कैसे ?कब और कौन करेगा?

यदि आप इस राज को जानकर अपने को हर पर सुरक्षित करना चाहते हैं तो पधारिए आध्यात्मिक विश्वविद्यालय में आध्यात्मिक विश्व विद्यालय, 

दिल्ली 9311161007


          


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