कृष्ण जन्माष्टमी आध्यात्मिक अर्थ
◾नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की अर्थात नंदबाबा का आनंद कौन ? क्रुष्ण बच्चा !
कृष्ण जन्माष्टमी यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की याद में मनाया जाता है, जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और रात 12 बजे श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं। भगवान कृष्ण की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है और उन्हें माखन-मिश्री, पंजीरी, पंचामृत और विभिन्न मिष्ठान्न का भोग लगाया जाता है।
क्रुष्ण जन्म रात्रि वो भी १२ बजे मनाते ईश्वर अज्ञान ताकी अंधकार जब बढ़ जाता है तब आते हैं । शिव रात्रि भी कहते हैं शिव की भी रात्रि मनाते हैं अब शिव और क्रुष्ण का कोई संबंध तो नहीं है ।
" गोविन्दा आला रे मटकी संभाल ब्रिज बाला "
जब जब संगमयुग आता है तो ऊंची स्टेज में जाकर
बुद्धि रूपी मटकी फोड़ी जाती है । जो पत्थर बुद्धि है उनकी पत्थर बुद्धि को तोडके उस में से सार निकलता है।
क्रुष्ण की अष्टमी मनाते हैं । क्योंकि उसे आठवां पुत्र मानते हैं। उसके पहले सात और आठवां क्रुष्ण को कहते हैं यह अष्टदेव का गायन है ।
क्रुष्ण अर्थात आकर्षित करनेवाला कहते हैं क्रुष्ण बांसुरी बजाकर गोपीकाओं को अपनी ओर आकर्षित करते थे एसी आख्याईका है । अब बुद्धि से सोचिए क्या भगवान कांस्य की बासुरी बजाते बैठे क्या इसलिए ईश्वर इस सूष्टि पर आते हैं ।वे तो पुरानी दुनिया का विनाश नई दुनिया की स्थापना हेतु आते हैं।
भगवत गीता श्लोक 4/8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे
भावार्थ
मैं साधुओं की रक्षा करने के लिए, दुष्टों का विनाश करने के लिए, और धर्म को स्थापित करने के लिए दो युगों कलियुग और सतयुग के संधिकाल में जन्म लेता हुं ।
कलह क्लेश की दुनिया का विनाश और नई सतयुगी दुनिया की स्थापना हेतु वे आते हैं ।
बांसुरी जो दिखाई है वो ज्ञान मुरली है जो शिव स्वयं इस सुष्टि पर साकार में आते है ज्ञान सुनाते हैं जो गिता में बोला है " गुह्यत गुह्य तरम ज्ञानम् "
क्रुष्ण गोपियों के वस्त्र चुराते माखन चुराते थे , क्यूं? क्या हमारे भगवान चोर थे जो उनका गायन इस प्रकारसे करते हैं । गोपगोपिया अर्थात आत्माएं जो ईश्वर से गुप्त संबंध जोड़ती है आत्मा जब शरीर में प्रवेश करती है तो शरीर रूपी वस्त्र है ।
भगवत गीता अध्याय 2/22
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गॄहयाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ।
आत्मा जो देहके भान में आकर पांच विकारों मे फंसती है गिता ज्ञान से राजयोग सिखलाकर आत्माओं का शरीर भान छुड़ाते जिसको ही वस्त्र चुराया( शरीर रूपीवस्त्र चुराना) एसा गायन हुआ है । माखन भी आत्मा रूपी माखन है जिनका देहका भान छुड़ाते है आत्माएं ज्ञान सुनने जो आत्मा का भोजन है ईश्वर के पिछे भागती है तो गायन कीया गोपीयों को भगाया ।
अध्याय 9/2 राजविद्या राजगुह्यं पवित्रं इदं उत्तमं। प्रत्यक्षावगमं सुसुखं कर्तुं अव्ययं ।
भावार्थ -अर्थात यह राजा उनके राज्य विद्या है उत्तम रजाई का रहस्य है पवित्र है सर्वोत्तम ज्ञान है प्रत्यक्ष
अर्थात साक्षात ईश्वर द्वारा जाना जाता है सहज पालन करने के लिए अत्यंत सुखदाई है अविनाशी है धर्मानुकूल भी है ।
अब क्रुष्ण छोटा बच्चा राजयोग की बातें क्या ही जाने वो कैसे राजयोग सिखाए ।
क्रुष्ण को बच्चे के रूप में दिखाते अर्थात उनको जन्म देनेवाले मात पिता अवश्य कोई है वे ही सुष्टि के रचैता और क्रुष्ण बच्चा सुष्टि का पहला पत्ता होना चाहिए इसीलिए गिता माता का पति क्रुष्ण बच्चा कैसे हो सकता है❓ क्रुष्ण तो गितामाता का बच्चा हुआ । श्रीमद् भगवत गीता में भगवान उवाच शब्द आया है अर्थात गिता भगवान ने गाई है तो गीता का पति कौन जो ही उसका रचैता है ।
ईश्वर को कहते हैं "त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव "अर्थात सुष्टि रचैता हमारे मात-पिता बंधु सखा हुए ना ! जो गिता श्लोक भी है
अध्याय 15/1
ऊर्ध्वमूलमध: शाखामस्वतं प्राहुर्व्यम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
अर्थ - ऋषियों ने सृष्टिरूपी अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन किया है, जो ब्राह्मणत्वरूपी जड़ों वाला वृक्ष है, जो मनुष्य सृष्टि के बीज प्रजापिता ब्रह्मा से उत्पन्न हुआ है, जिसकी नीचे की ओर ब्रह्मा के नाना धर्मों की शाखाएँ हैं और जिसके पत्ते वेद आदि हैं, उसे अविनाशी कहा गया है।
इस सुष्टि रूपी व्रुक्ष का बिज अर्थात सुष्टि का रचैता कौन ? अवश्य जानना होगा ।
तो गिता का भगवान कौन?? इसका गुह्य अर्थ जानने समझने के लिए अवश्य पधारें आध्यात्मिक विश्वविद्यालय में ।
आध्यात्मिक विश्वविद्यालय,
दिल्ली 9891370007







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